Indian education system | भारतीय शिक्षा प्रणाली {2021}

नमस्कार दोस्तों! लेख पढने से पहले हम आपको बता दें कि यह आपको विवादास्पद (controversial) लग सकता है। यहाँ हम भारतीय शिक्षा प्रणाली, यानि Indian education system के बारे में बात करने जा रहे हैं। यह लेख किसी के पक्ष में या किसी के विरुद्ध नहीं है, बल्कि हमने कुच्छ तथ्य बताये हैं जिन्हें आपको जानना चाहिए।
 
English सभी parents अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में डालना चाहते हैं, क्योंकि उनके लिए इंग्लिश ही intelligence और status को दर्शाता है। English का परिचय भारतीय एजुकेशन सिस्टम में Thomas Macaulay, जोकि 1830s में ब्रिटिश सरकार के सेक्रेटरी थे, उन्होंने किया था। भारत में संस्कृत और अरेबिक होने के बावजूद मैकौले ने इंग्लिश को अनिवार्य करने पर ज़ोर दिया। इसके दो कारण थे-  1. अंग्रेज़ों को बस clerks और interpreters की ज़रूरत थी अपना शासन चलाने के लिए, और     2. उन्हें एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनानी थी जिससे बच्चे intelligent नहीं बल्कि obedient बनें।  introduction-of-english introduction of english दुर्भाग्य की बात तो यह है कि आज भी भारत में 1830 में लागू किया हुआ education system चल रहा है, जिसमें क्षेत्रीय भाषा, बुद्धि और रचनात्मकता पर ज़ोर ना देकर आज्ञाकारिता (obedience) और अंग्रेज़ी पर focus किया जाता है। Macaulay की इस प्रणाली से भारत के विद्यार्थियों का intelligence तो नहीं बढ़ा, लेकिन इंग्लिश आने की वजह से उन्हें USA और इंग्लैंड के मार्केट के लिए तैयार ज़रूर कर दिया।  शीत युद्ध और उदारीकरण – Cold war and liberalization    1960 से 1990 के बीच भारत की अर्थव्यवस्था एक समाजवादी अर्थव्यवस्था (socialist economy) थी जहाँ business setup करने पर बहुत ज़्यादा प्रतिबन्ध थे और आयात में high tariff थे। इसकी वजह से ना तो भारतियों को बिज़नेस करने के अवसर मिल रहे थे और ना ही पश्चिमी संस्कृति का exposure मिल रहा था।  प्रतिबंधों की हताशा के कारण भारत के लोग देश से बाहर जाने के लिए तैयार थे। भारतीयों को पहला मौका मिला शीत युद्ध के समय, जब रूस ने Sputnik उपग्रह लॉन्च किया। रूस को पिछाड़ने की होड़ में USA में इंजीनियरों की मांग बढ़ गई और USA ने अपनी अर्थव्यवस्था का रास्ता विदेशियों के लिए खोल दिया। अंग्रेज़ी के ज्ञान और भारत में प्रतिबंधों की वजह से कई भारतियों को USA में काम करने के अवसर और आज़ादी मिली।  cold-war cold war 1990s में मनमोहन सिंह के liberalization ने भारतीय अर्थव्यवस्था के सारे प्रतिबंधों को हटा के भारत की अर्थव्यवस्था को ग्लोबल इकोनामी से जोड़ दिया। उसी दौरान नारायण मूर्ति और उनके startup ने USA की बड़ी कंपनियों के लिए कुछ projects को सफलतापूर्वक पूरा किया। इससे USA और UK को भारतियों के टैलेंट का अंदाज़ा हुआ और वे भारी मात्रा में अपना काम भारतीयों को outsource करने लगे, जिससे कि IT उद्योग में उछाल आ गया। विदेशी कंपनियों में अवसर और IT कंपनियों की सफेद कॉलर जॉब ने देश में इंजीनियरों की आवश्यकता बढ़ा दी। Engineers की आवश्यकता ने एक नई घटना (phenomenon) को जन्म दिया। वह था कोचिंग इंडस्ट्री।  माता-पिता, कोचिंग और आईआईटी – Parents, coaching and IIT    भारत में बच्चे को इंजीनियर बनाने की शुरुआत 10वीं क्लास से ही शुरू हो जाती है, क्योंकि भारतीय parents का सपना अपने बच्चों को IIT से इंजीनियर बनाने का होता है। IITs की शुरुआत जवाहरलाल नेहरु जी ने की थी। 4 IITs की स्थापना देश के चार कोनों में की गई। IIT Kharagpur भारत का पहला IIT, जो कि ब्रिटिशर्स के एक detention कैंप में बनाया गया, दूसरा IIT Bombay यूनेस्को और रूस की मदद से सेटअप किया गया, IIT कानपुर M.I.T. की सहायता से, और IIT Madras जर्मनी की मदद से सेटअप किया गया।  IITs की प्रतिष्ठा और गुणवत्ता पूरी दुनिया में चर्चित है। नेहरू जी भी अपने पोते राजीव का एडमिशन IIT में नहीं करा पाए थे। इसलिए बाद में राजीव को लंदन जाकर पढ़ाई करनी पड़ी। भारत में IITs की सीटें तो बहुत कम हैं, लेकिन परीक्षा देने वाले लाखों विद्यार्थी हैं।  IIT में एडमिशन की प्रक्रिया को और कठिन बना दिया है आरक्षण ने। Emergency के बाद 1977 में जनता पार्टी की सरकार ने सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों की पहचान करने के लिए ‘मंडल कमीशन’ का गठन किया था, जिसने अपनी रिपोर्ट 1980 में जमा की। 10 साल तक किसी भी सरकार ने इस रिपोर्ट पर कोई कार्यवाई नहीं की क्योंकि इस रिपोर्ट की सिफ़ारिश देश में बड़े बदलाव ला सकती थी। 1990 में V.P. Singh की सरकार ने इसे लागू कर दिया, जिससे OBC को सरकारी कॉलेज में 27% का आरक्षण मिल गया। इसके साथ ही SC/ST के लिए पहले से ही 22.5% आरक्षण था।  IIT IIT कम seats, आरक्षण और parents के सपनों ने विद्यार्थियों के लिए IIT में एडमिशन एक जंग बना दी और वे 10वीं से ही IIT की तैयारी में लगने लगे। 10वीं के बाद जैसे ज़िन्दगी के 2 साल छात्रों के जीवन से गायब हो गए और वे दिन-रात सब कुछ भुला कर IITan बनने की तैयारी करने लगे। 10वीं बोर्ड का पेपर जैसे बच्चों के लिए जीने और मरने का सवाल हो गया। क्योंकि भारत में समाज ने पहले से ही benchmark बना रखे हैं। जो बच्चे अच्छे पर्सेंट लाते हैं वह science लेंगे और जो एवरेज पर्सेंट लाते हैं वह commerce लेंगे। साथ ही अगर लड़का है तो इंजीनियर बनेगा और लड़की है तो वह डॉक्टर बनेगी।  इसी कड़ी प्रतिस्पर्धा और समाज के दबाव ने Multi billion-dollar IIT कोचिंग इंडस्ट्री को जन्म दिया। यह industry बॉलीवुड से भी बड़ी इंडस्ट्री है। कोचिंग सेंटर की बात करें तो सबसे पहले नाम आता है कोटा का। IIT की कोचिंग की कहानी कोटा के बिना अधूरी है। कोटा, जो एक छोटा-सा शहर था चंबल नदी के किनारे। वहाँ J.K. Synthetic कंपनी में काम करते थे एक गरीब परिवार में जन्मे विनोद कुमार बंसल। बंसल को एक दुर्लभ बीमारी से diagnose किया गया, जिसमें उम्र के साथ मांसपेशियाँ काम करना बंद कर देती हैं। इसलिए वे ज़्यादा दिनों तक कंपनी में काम नहीं कर सकते थे।     तभी किसी ने उन्हें टीचिंग करने की सलाह दी। वह गणित में अच्छे थे इसलिए उन्होंने बच्चों को maths पढ़ाना शुरू किया। इसी दौरान J.K. Synthetic कंपनी बंद हो गई और बंसल अपना पूरा ध्यान टीचिंग में लगाने लगे। बाद में उनके साथ आर.के. वर्मा, IIT दिल्ली के पूर्व छात्र प्रमोद महेश्वरी और बी.वी. राव मिल गए और बच्चों को IIT की कोचिंग देने लगे।  1991 से 1995 के बीच में Bansal classes से बच्चों के बढ़ते IIT में चयन से Bansal classes को प्रसिद्द बना दिया और पूरे देश से बच्चे वहाँ पढ़ने लगे। इसके बाद प्रमोद महेश्वरी ने Career point का गठन किया, आर.के. वर्मा ने Resonance और बी.वी. राव ने Rav Academy बनाई। Coaching industry की वजह से कोटा कि अर्थव्यवस्था बढ़ने लगी।  दूसरा बहुचर्चित कोचिंग सेंटर है बिहार में, आनंद कुमार की ‘Super 30’. आनंद कुमार गणित के एक विशेषज्ञ हैं। पैसे ना होने की वजह से वे Cambridge में पढ़ने नहीं जा पाए। आनंद कुमार उन गरीब बच्चों को, जो अपने रहने खाने का भी इंतज़ाम नहीं कर सकते, उनको हर साल IIT की कोचिंग देते हैं। उनका ‘Super 30’ आज पूरे विश्व में प्रसिद्ध है।     वहीँ आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु की बात करें तो, देश में सबसे ज़्यादा इंजीनियरिंग कॉलेज आंध्र प्रदेश में हैं। देश के 40% इंजीनियर आंध्र और तमिलनाडु से निकलते हैं। आन्ध्र का IIT मार्केट नारायणा और श्री चैतन्य कोचिंग इंस्टीट्यूट ने dominate कर रखा है। यहाँ बच्चों को strict discipline में रखा जाता है IIT की तैयारी के दौरान। आन्ध्र की दहेज संस्कृति भी IITan बनने की होड़ का एक कारण है। मध्य भारत में कानपुर IIT कोचिंग का hub है।  10th, 12th और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा एक भव्य समारोह बन गए हैं, जिसमें बच्चों के साथ-साथ उनका पूरा परिवार जुटा रहता है तैयारी, काउंसलिंग और पूजा पाठ में। इसी वजह से बच्चों पर परीक्षा का बहुत ज़्यादा दबाव रहता है और नतीजा teens में आत्महत्या कि दर भी बढ़ती जा रही है। इस चूहा दौड़ (rat race) का सारा श्रेय Indian education system को जाता है, क्योंकि हमारे parents भी इसी सिस्टम का हिस्सा हैं।  भारतीय शिक्षा प्रणाली – Indian education system आईये प्रकाश डालते हैं भारतीय शिक्षा प्रणाली पे। भारतीय शिक्षा प्रणाली ब्रिटिशर्स ने आज्ञाकारी clerks बनाने के लिए डिज़ाइन की थी। स्कूली बच्चों को ऐसे उत्पादित करते हैं जैसे फैक्ट्री से products निकलते हैं। जैसे फैक्ट्री से निकले हर product का बैच नंबर होता है, वैसे ही स्कूल या कॉलेज से निकले विद्यार्थियों का batch year होता है। जैसे उत्पादों को स्वीकार करने और अस्वीकार करने के लिए सख्त गुणवत्ता पैरामीटर होते हैं, वैसे ही विद्यार्थियों के पास और फेल होने के लिए कुछ imaginary numbers fix कर दिए गए हैं, जिसे हम percentage कहते हैं।  indian-education-system indian education system कारखाने के कर्मचारियों से केवल उन निर्देशों का पालन करने की अपेक्षा की जाती है जो उन्हें दिए गए हों। वहीँ स्कूल में विद्यार्थियों को टीचर और parents जो बताते हैं उसका पालन करने और ‘रट्टा लर्निंग’ में ही ज़ोर दिया जाता है। पूर्ण विकास के लिए जो सबसे ज़रूरी है, जैसे खेल, कला और रचनात्मकता, इन चीज़ों को अतिरिक्त पाठ्यक्रम गतिविधि (extra curriculum activity) माना जाता है। यानी कि वह पाठ्यक्रम में अतिरिक्त है।  समाज में parents के प्रति आज्ञाकारिता और विफलता, और रचनात्मकता के प्रति नकारात्मक रवैया, इस वजह से विद्यार्थी अपना भविष्य तय नहीं कर पाते और वे इंजीनियर बनने की चूहा दौड़ में लग जाते हैं। आज हालत ये है कि student इंजीनियर पहले बनते हैं और फिर उन्हें समझ आता है कि जीवन में क्या करना है। कई लोग इंजीनियर बनने के बाद ही अलग-अलग क्षेत्रों में कामयाब हुए. आज startups, musicians, stand-up comedians, इन सारे क्षेत्रों में इंजीनियरों का दबदबा है।  दोस्तों, जीवन में कभी भी नंबर पर ध्यान नहीं देना चाहिए। Life हर चरण में आपको अवसर देती है। इसलिए सिर्फ़ 10th, 12th, IIT, UPSC, MBA की rat race पर ध्यान देने के बजाय छात्रों को जीवन को समग्र रूप से देखना चाहिए। वहीँ माता-पिता को भी अपने बच्चों को विविध क्षेत्रों में जाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।  कृपया टिप्पणी करें और हमें बताएँ कि आप Indian education system के बारे में क्या सोचते हैं और छात्रों के मानसिक तनाव को कम करने के लिए क्या किया जा सकता है।  लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद।
Indian education system | भारतीय शिक्षा प्रणाली {2021}

इस लेख में हम जानेंगे India के सबसे बड़े जूनून (obsession) Engineering और Indian education system के बारे में, Adhitya Iyer की किताब ‘The great Indian obsession‘ से।

भारत में सालाना 10 लाख से अधिक विद्यार्थी इंजीनियर बनते हैं। यह Iceland की जनसँख्या का 2 गुना है। Engineer बनने की होड़ लग गई है। आइये समझते हैं कैसे बना इंजीनियरिंग भारतीयों का सबसे बड़ा obsession.

English

सभी parents अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में डालना चाहते हैं, क्योंकि उनके लिए इंग्लिश ही intelligence और status को दर्शाता है। English का परिचय भारतीय एजुकेशन सिस्टम में Thomas Macaulay, जोकि 1830s में ब्रिटिश सरकार के सेक्रेटरी थे, उन्होंने किया था। भारत में संस्कृत और अरेबिक होने के बावजूद मैकौले ने इंग्लिश को अनिवार्य करने पर ज़ोर दिया। इसके दो कारण थे-

1. अंग्रेज़ों को बस clerks और interpreters की ज़रूरत थी अपना शासन चलाने के लिए, और

2. उन्हें एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनानी थी जिससे बच्चे intelligent नहीं बल्कि obedient बनें।

दुर्भाग्य की बात तो यह है कि आज भी भारत में 1830 में लागू किया हुआ education system चल रहा है, जिसमें क्षेत्रीय भाषा, बुद्धि और रचनात्मकता पर ज़ोर ना देकर आज्ञाकारिता (obedience) और अंग्रेज़ी पर focus किया जाता है। Macaulay की इस प्रणाली से भारत के विद्यार्थियों का intelligence तो नहीं बढ़ा, लेकिन इंग्लिश आने की वजह से उन्हें USA और इंग्लैंड के मार्केट के लिए तैयार ज़रूर कर दिया।

शीत युद्ध और उदारीकरण – Cold war and liberalization

1960 से 1990 के बीच भारत की अर्थव्यवस्था एक समाजवादी अर्थव्यवस्था (socialist economy) थी जहाँ business setup करने पर बहुत ज़्यादा प्रतिबन्ध थे और आयात में high tariff थे। इसकी वजह से ना तो भारतियों को बिज़नेस करने के अवसर मिल रहे थे और ना ही पश्चिमी संस्कृति का exposure मिल रहा था।

प्रतिबंधों की हताशा के कारण भारत के लोग देश से बाहर जाने के लिए तैयार थे। भारतीयों को पहला मौका मिला शीत युद्ध के समय, जब रूस ने Sputnik उपग्रह लॉन्च किया। रूस को पिछाड़ने की होड़ में USA में इंजीनियरों की मांग बढ़ गई और USA ने अपनी अर्थव्यवस्था का रास्ता विदेशियों के लिए खोल दिया। अंग्रेज़ी के ज्ञान और भारत में प्रतिबंधों की वजह से कई भारतियों को USA में काम करने के अवसर और आज़ादी मिली।

1990s में मनमोहन सिंह के liberalization ने भारतीय अर्थव्यवस्था के सारे प्रतिबंधों को हटा के भारत की अर्थव्यवस्था को ग्लोबल इकोनामी से जोड़ दिया। उसी दौरान नारायण मूर्ति और उनके startup ने USA की बड़ी कंपनियों के लिए कुछ projects को सफलतापूर्वक पूरा किया। इससे USA और UK को भारतियों के टैलेंट का अंदाज़ा हुआ और वे भारी मात्रा में अपना काम भारतीयों को outsource करने लगे, जिससे कि IT उद्योग में उछाल आ गया। विदेशी कंपनियों में अवसर और IT कंपनियों की सफेद कॉलर जॉब ने देश में इंजीनियरों की आवश्यकता बढ़ा दी। Engineers की आवश्यकता ने एक नई घटना (phenomenon) को जन्म दिया। वह था कोचिंग इंडस्ट्रीी
माता-पिता, कोचिंग और आईआईटी – Parents, coaching and IIT

भारत में बच्चे को इंजीनियर बनाने की शुरुआत 10वीं क्लास से ही शुरू हो जाती है, क्योंकि भारतीय parents का सपना अपने बच्चों को IIT से इंजीनियर बनाने का होता है। IITs की शुरुआत जवाहरलाल नेहरु जी ने की थी। 4 IITs की स्थापना देश के चार कोनों में की गई। IIT Kharagpur भारत का पहला IIT, जो कि ब्रिटिशर्स के एक detention कैंप में बनाया गया, दूसरा IIT Bombay यूनेस्को और रूस की मदद से सेटअप किया गया, IIT कानपुर M.I.T. की सहायता से, और IIT Madras जर्मनी की मदद से सेटअप किया गया।

IITs की प्रतिष्ठा और गुणवत्ता पूरी दुनिया में चर्चित है। नेहरू जी भी अपने पोते राजीव का एडमिशन IIT में नहीं करा पाए थे। इसलिए बाद में राजीव को लंदन जाकर पढ़ाई करनी पड़ी। भारत में IITs की सीटें तो बहुत कम हैं, लेकिन परीक्षा देने वाले लाखों विद्यार्थी हैं।

IIT में एडमिशन की प्रक्रिया को और कठिन बना दिया है आरक्षण ने। Emergency के बाद 1977 में जनता पार्टी की सरकार ने सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों की पहचान करने के लिए ‘मंडल कमीशन’ का गठन किया था, जिसने अपनी रिपोर्ट 1980 में जमा की। 10 साल तक किसी भी सरकार ने इस रिपोर्ट पर कोई कार्यवाई नहीं की क्योंकि इस रिपोर्ट की सिफ़ारिश देश में बड़े बदलाव ला सकती थी। 1990 में V.P. Singh की सरकार ने इसे लागू कर दिया, जिससे OBC को सरकारी कॉलेज में 27% का आरक्षण मिल गया। इसके साथ ही SC/ST के लिए पहले से ही 22.5% आरक्षण था।

कम seats, आरक्षण और parents के सपनों ने विद्यार्थियों के लिए IIT में एडमिशन एक जंग बना दी और वे 10वीं से ही IIT की तैयारी में लगने लगे। 10वीं के बाद जैसे ज़िन्दगी के 2 साल छात्रों के जीवन से गायब हो गए और वे दिन-रात सब कुछ भुला कर IITan बनने की तैयारी करने लगे। 10वीं बोर्ड का पेपर जैसे बच्चों के लिए जीने और मरने का सवाल हो गया। क्योंकि भारत में समाज ने पहले से ही benchmark बना रखे हैं। जो बच्चे अच्छे पर्सेंट लाते हैं वह science लेंगे और जो एवरेज पर्सेंट लाते हैं वह commerce लेंगे। साथ ही अगर लड़का है तो इंजीनियर बनेगा और लड़की है तो वह डॉक्टर बनेगी।

इसी कड़ी प्रतिस्पर्धा और समाज के दबाव ने Multi billion-dollar IIT कोचिंग इंडस्ट्री को जन्म दिया। यह industry बॉलीवुड से भी बड़ी इंडस्ट्री है। कोचिंग सेंटर की बात करें तो सबसे पहले नाम आता है कोटा का। IIT की कोचिंग की कहानी कोटा के बिना अधूरी है। कोटा, जो एक छोटा-सा शहर था चंबल नदी के किनारे। वहाँ J.K. Synthetic कंपनी में काम करते थे एक गरीब परिवार में जन्मे विनोद कुमार बंसल। बंसल को एक दुर्लभ बीमारी से diagnose किया गया, जिसमें उम्र के साथ मांसपेशियाँ काम करना बंद कर देती हैं। इसलिए वे ज़्यादा दिनों तक कंपनी में काम नहीं कर सकते थे।

तभी किसी ने उन्हें टीचिंग करने की सलाह दी। वह गणित में अच्छे थे इसलिए उन्होंने बच्चों को maths पढ़ाना शुरू किया। इसी दौरान J.K. Synthetic कंपनी बंद हो गई और बंसल अपना पूरा ध्यान टीचिंग में लगाने लगे। बाद में उनके साथ आर.के. वर्मा, IIT दिल्ली के पूर्व छात्र प्रमोद महेश्वरी और बी.वी. राव मिल गए और बच्चों को IIT की कोचिंग देने लगे।

1991 से 1995 के बीच में Bansal classes से बच्चों के बढ़ते IIT में चयन से Bansal classes को प्रसिद्द बना दिया और पूरे देश से बच्चे वहाँ पढ़ने लगे। इसके बाद प्रमोद महेश्वरी ने Career point का गठन किया, आर.के. वर्मा ने Resonance और बी.वी. राव ने Rav Academy बनाई। Coaching industry की वजह से कोटा कि अर्थव्यवस्था बढ़ने लगी।

दूसरा बहुचर्चित कोचिंग सेंटर है बिहार में, आनंद कुमार की ‘Super 30’. आनंद कुमार गणित के एक विशेषज्ञ हैं। पैसे ना होने की वजह से वे Cambridge में पढ़ने नहीं जा पाए। आनंद कुमार उन गरीब बच्चों को, जो अपने रहने खाने का भी इंतज़ाम नहीं कर सकते, उनको हर साल IIT की कोचिंग देते हैं। उनका ‘Super 30’ आज पूरे विश्व में प्रसिद्ध है।

वहीँ आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु की बात करें तो, देश में सबसे ज़्यादा इंजीनियरिंग कॉलेज आंध्र प्रदेश में हैं। देश के 40% इंजीनियर आंध्र और तमिलनाडु से निकलते हैं। आन्ध्र का IIT मार्केट नारायणा और श्री चैतन्य कोचिंग इंस्टीट्यूट ने dominate कर रखा है। यहाँ बच्चों को strict discipline में रखा जाता है IIT की तैयारी के दौरान। आन्ध्र की दहेज संस्कृति भी IITan बनने की होड़ का एक कारण है। मध्य भारत में कानपुर IIT कोचिंग का hub है।

10th, 12th और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा एक भव्य समारोह बन गए हैं, जिसमें बच्चों के साथ-साथ उनका पूरा परिवार जुटा रहता है तैयारी, काउंसलिंग और पूजा पाठ में। इसी वजह से बच्चों पर परीक्षा का बहुत ज़्यादा दबाव रहता है और नतीजा teens में आत्महत्या कि दर भी बढ़ती जा रही है। इस चूहा दौड़ (rat race) का सारा श्रेय Indian education system को जाता है, क्योंकि हमारे parents भी इसी सिस्टम का हिस्सा हैं।

भारतीय शिक्षा प्रणाली – Indian education system

आईये प्रकाश डालते हैं भारतीय शिक्षा प्रणाली पे। भारतीय शिक्षा प्रणाली ब्रिटिशर्स ने आज्ञाकारी clerks बनाने के लिए डिज़ाइन की थी। स्कूली बच्चों को ऐसे उत्पादित करते हैं जैसे फैक्ट्री से products निकलते हैं। जैसे फैक्ट्री से निकले हर product का बैच नंबर होता है, वैसे ही स्कूल या कॉलेज से निकले विद्यार्थियों का batch year होता है। जैसे उत्पादों को स्वीकार करने और अस्वीकार करने के लिए सख्त गुणवत्ता पैरामीटर होते हैं, वैसे ही विद्यार्थियों के पास और फेल होने के लिए कुछ imaginary numbers fix कर दिए गए हैं, जिसे हम percentage कहते हैं।

कारखाने के कर्मचारियों से केवल उन निर्देशों का पालन करने की अपेक्षा की जाती है जो उन्हें दिए गए हों। वहीँ स्कूल में विद्यार्थियों को टीचर और parents जो बताते हैं उसका पालन करने और ‘रट्टा लर्निंग’ में ही ज़ोर दिया जाता है। पूर्ण विकास के लिए जो सबसे ज़रूरी है, जैसे खेल, कला और रचनात्मकता, इन चीज़ों को अतिरिक्त पाठ्यक्रम गतिविधि (extra curriculum activity) माना जाता है। यानी कि वह पाठ्यक्रम में अतिरिक्त है।

समाज में parents के प्रति आज्ञाकारिता और विफलता, और रचनात्मकता के प्रति नकारात्मक रवैया, इस वजह से विद्यार्थी अपना भविष्य तय नहीं कर पाते और वे इंजीनियर बनने की चूहा दौड़ में लग जाते हैं। आज हालत ये है कि student इंजीनियर पहले बनते हैं और फिर उन्हें समझ आता है कि जीवन में क्या करना है। कई लोग इंजीनियर बनने के बाद ही अलग-अलग क्षेत्रों में कामयाब हुए. आज startups, musicians, stand-up comedians, इन सारे क्षेत्रों में इंजीनियरों का दबदबा है।

दोस्तों, जीवन में कभी भी नंबर पर ध्यान नहीं देना चाहिए। Life हर चरण में आपको अवसर देती है। इसलिए सिर्फ़ 10th, 12th, IIT, UPSC, MBA की rat race पर ध्यान देने के बजाय छात्रों को जीवन को समग्र रूप से देखना चाहिए। वहीँ माता-पिता को भी अपने बच्चों को विविध क्षेत्रों में जाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

कृपया टिप्पणी करें और हमें बताएँ कि आप Indian education system के बारे में क्या सोचते हैं और छात्रों के मानसिक तनाव को कम करने के लिए क्या किया जा सकता है।

लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद।

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